Aravalli के बाद Chambal पर कैंची! घड़ियाल अभ्यारण्य से 732 हेक्टेयर बाहर

गौरव त्रिपाठी
गौरव त्रिपाठी

राजस्थान में पर्यावरण की “रेड लाइन्स” अब काग़ज़ों पर रह गई हैं। पहले अरावली पर्वतमाला और अब राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभ्यारण्य
सरकार के ताज़ा फैसले ने वो सवाल खड़े कर दिए हैं, जो सिर्फ जंगलों के नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के हैं।

कोटा में हैंगिंग ब्रिज से लेकर कोटा बैराज तक का 732 हेक्टेयर इलाका अब चंबल घड़ियाल अभ्यारण्य से मुक्त कर दिया गया है। यानी जिस ज़मीन को दशकों तक वन्यजीवों का घर माना गया, वहां अब इंसानी कंक्रीट को वैधता मिल गई है।

1972 का कानून, 2025 का फैसला

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत जिस क्षेत्र पर 50 साल से प्रतिबंध था, उसे अब डिनोटिफाई कर दिया गया है। राजस्थान सरकार ने 23 दिसंबर 2025 को राज्यपाल की मंजूरी के बाद इसकी अधिसूचना जारी कर दी।

सरकारी दलील साफ है— यह फैसला National Board of Wildlife (NBWL) की सिफारिश और Wildlife Act की धारा 26-K(3) के तहत लिया गया है।

लेकिन सवाल भी उतना ही साफ है— क्या कानून की धाराएं घड़ियालों को शोर, सीमेंट और प्रदूषण से बचा पाएंगी?

40 हजार घर, 206 खसरे और सिमटता जंगल

इस फैसले से किशोरपुरा (208.56 हेक्टेयर), शिवपुरा (320.33 हेक्टेयर), सकतपुरा (186.36 हेक्टेयर), गुमानपुरा, नयागांव, रामपुरा समेत कई इलाके अब सेंचुरी से बाहर हो गए हैं। करीब 40 हजार घरों को पट्टे मिलने और निर्माण कार्य शुरू होने का रास्ता साफ हो गया है।

Government बोले: “Main Habitat Safe Hai”

सरकार का दावा है कि घड़ियाल, गंगेटिक डॉल्फिन, दुर्लभ जलीय जीव के मुख्य आवास क्षेत्र सुरक्षित रहेंगे
लेकिन पर्यावरणविद पूछ रहे हैं— Habitat सिर्फ नदी नहीं होता, उसका शांत वातावरण भी होता है।

नक्शे में जंगल, ज़मीन पर सन्नाटा

आज 8 हेक्टेयर, कल 80, और परसों शायद पूरा अभयारण्य। Development का बुलडोज़र हमेशा यही कहता है— “बस थोड़ा सा ही तो हटाया है।”

अरावली में भी यही कहा गया था… अब चंबल में कहा जा रहा है… और अगला नंबर किसका होगा?

Opposition का वार: “खतरनाक मिसाल”

विपक्ष इसे dangerous precedent बता रहा है। उसका कहना है— एक बार अगर Sanctuary के दरवाज़े खुल गए, तो विकास के नाम पर संरक्षण की आत्मा ही कट जाएगी।

चंबल सिर्फ नदी नहीं, इकोसिस्टम है

1983 में अधिसूचित चंबल घड़ियाल अभयारण्य राजस्थान-MP-UP की सीमाओं से गुजरता है। और भारत के सबसे संवेदनशील aquatic ecosystems में से एक है।

पर्यावरण विशेषज्ञों की चेतावनी साफ है— Conservation अगर सिर्फ फाइलों में रह गया, तो नदी में सिर्फ पानी बचेगा… जीवन नहीं।

आख़िरी सवाल

आज सवाल चंबल का है… कल सवाल किसका होगा?

Aravalli के बाद Chambal… और Chambal के बाद कौन?

जवाब अब सरकार को देना है।

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